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सितंबर 8, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
पेड कहीं नही जाते खड़े हैं इस हाड कंपाती सर्द पोष में खेत के बीचों बीच नहीं जलाते कोई अलाब भीगते हैं सावन भादों नहीं लगाते कोई छत्तरी उनके ऊपर से गुजर जाते हैं हवाई जहाज वे वहीं खड़े रहते हैं उदास औचक देखते रहते हैं बगल से गुजरती बस / रेल धुंध में लिपटे हुए कुछ नहीं बोलते जब रून्ठ जाता है सूरज नहीं सुनाई देती इनकी सुबकियां इन्होने देखा घात लगते बहेलियों को असहाय देखा अप्हत होते बच्चे को इन्होने देखा पाले से छाजू के टूटते सपनों को पेड़ की छाँव में कसमें खाई यहीं जुदा होते देखते हैं पेड़ खड़े हैं ताकि लिपट कर रो सके कोई पेड़ के अनुलोम विलोम से चलती है मानवीय धोंकनी पेड़ भूल जाते हैं सरसों की खिलखिलाहट में अपने गम मुस्करा देते हैं जब शाम को लोटते हैं पक्षी उनकी शरण में यह जानते हुए कल फ़िर उड़ जायेंगे पेड़ वहीं खड़े रहते हैं इन्तजार में .