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पेड कहीं नही जाते खड़े हैं इस हाड कंपाती सर्द पोष में खेत के बीचों बीच नहीं जलाते कोई अलाब भीगते हैं सावन भादों नहीं लगाते कोई छत्तरी उनके ऊपर से गुजर जाते हैं हवाई जहाज वे वहीं खड़े रहते हैं उदास औचक देखते रहते हैं बगल से गुजरती बस / रेल धुंध में लिपटे हुए कुछ नहीं बोलते जब रून्ठ जाता है सूरज नहीं सुनाई देती इनकी सुबकियां इन्होने देखा घात लगते बहेलियों को असहाय देखा अप्हत होते बच्चे को इन्होने देखा पाले से छाजू के टूटते सपनों को पेड़ की छाँव में कसमें खाई यहीं जुदा होते देखते हैं पेड़ खड़े हैं ताकि लिपट कर रो सके कोई पेड़ के अनुलोम विलोम से चलती है मानवीय धोंकनी पेड़ भूल जाते हैं सरसों की खिलखिलाहट में अपने गम मुस्करा देते हैं जब शाम को लोटते हैं पक्षी उनकी शरण में यह जानते हुए कल फ़िर उड़ जायेंगे पेड़ वहीं खड़े रहते हैं इन्तजार में .

kavita

गोलकुंडा -------------------- सात परकोटों के पीछे रहते थे निजाम अपनी रियाया की परछाइयों से बहुत दूर तब भी अब भी रहते हें ज़ेड श्रेणी के सुरक्षा चक्र के बीच टेड़े मेडे रास्तों से बनाया गोलकुंडा का किला जहाँ कुछ भी न था वहाँ बस्तियां है जहाँ महल थे वहाँ खंडहर हैं ...

कविता

सच     जब भी आता है संकट  इंसान याद करता है   माँ और ईश्वर को   माँ को ईश्वर से ज्यादा प्यारा है इंसान  वह आ भी जाती है  लेकिन ईश्वर कभी नही आता फिर भी  इन्सान आस्था ओढ़े  बाट देखता है ईश्वर की !!