kavita

गोलकुंडा
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सात परकोटों के पीछे
रहते थे निजाम
अपनी रियाया की परछाइयों से
बहुत दूर
तब भी
अब भी रहते हें ज़ेड श्रेणी के सुरक्षा चक्र के बीच
टेड़े मेडे रास्तों से बनाया गोलकुंडा का किला
जहाँ कुछ भी न था
वहाँ बस्तियां है
जहाँ महल थे वहाँ खंडहर हैं
खंडहरों मैं भटकती
पर्यटकों से भयाक्रांत चमगादड

रामदास की जेल की दीवारों पर
चस्पा हैं यातनाओं के फोसिल
रानीमहल के आले
पथराई आँखों से बाट जोहते हैं आइनों की
आइना निहारती रानियों की
पसरा हुआ सन्नाटा लील चुका है
हँसी और किलकारियाँ

काई की गिरफ्त में है बेजार स्नानकुंड
कैसे भुला पाया होगा
रानियाँ
उसी के बदन पर करती थीं गुलाब जल से
जलक्रीड़ा
कराहता है दरबार हाल
न कोई ऐलान न कोई फरियाद
न कोई खास न कोई आम
इन ही झरोंखों से निहारतें होंगे हैदराबाद निजाम
नहीं है किसी राजा की मूरत
नहीं बचा है तख्तोताज
क्या बच पाएंगे
स्मृति वनों में उगे मूर्तियों के अम्बार
जब न बच पाये लेनिन और सद्दाम के शिल्पाकार
खत्म हो गई सल्तनतें
खत्म हो गए रनिवास
शेष है श्रम के मसाले और ग्रेनेइट पत्थर की जुगलबंदी
रोती है जार जार मूसी नदी अपनी बैनूरी पे बार बार
जिसने देखा कुतुबशाह और भागमती का प्यार
प्रेम की स्म्रतियों का संसार
चारमीनार सैकडों बरसों पार
एक दिन
न होगा गोलकुंडा
न होगी चारमीनार
सिर्फ़ प्रेम से बचेगा संसार.

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