लगभग पैंतीस बरस पहले राजस्थान दिवस पर दिल्ली में आयोजित एक कवि सम्मलेन में भाग लेने गया था ,तब यह गीत लिखा | आज राजस्थान दिवस पर आप सबकी नज़र -
मीलों लम्बे रेत के टीले
राज बिगड़ते बनते टीले
जिनकी तपन से बन कर निकले
सोना सा इंसान
ऐसा है राजस्थान ...
बूँद बूँद पानी को तरसे
मेहा बरसे या न बरसे
फिर भी शीतल मन से निकले
चंग रसिया की तान
ऐसा है राजस्थान ...
अजब वसंत इन्हें मिलता है
छोड़ द्वार-घर चल पड़ता है
ऊंटों के रेवड़ संग घूमे
सारा हिन्दुस्तान
ऐसा है राजस्थान ...
सरसों की हर फली कांपती
आँगन और दीवार हांफती
शायद कोई ग्रहण लगा है
जलने लगा इंसान
ऐसा है राजस्थान ...
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