कविता : फाल्गुन में थार

 जैसलमेर की स्मृतियों से एक और विम्ब प्रस्तुत है! प्रकृति कैसे रंग बदलती है फाल्गुन के बाद उसकी एक अनुभूति:कंप्यूटर से सेवन घास को सही फॉण्ट नहीं दे रहा हूँ क्षमा करेंगे !

फाल्गुन में थार
माघ के जाते ही
लौटने लगे हैं पावणे
देश परदेश के
बावरी हो उठती है रेत
सूरज का माथा चढ़ते ही
बिफ़र कर लपकती है आसमान माथे
जैसे कह रही हो
क्यों छीन ली शीतलता
चली आती है डामर की सड़क तक
पूछते हुए चाँद का पता
झुलसने लगी है सेवन घास
झुलसने लगी हैं झाड़ियाँ
उतार लिए गए हैं
भेड़ों के गहने भी
फिर विस्थापित होना है रेवड़ संग
भटकना है गाँव दर गाँव
जीवन के लिए
टोल के टोल फाल्गुन के बाद
पीछे रह जाएँगी प्यासी दो आँखें
प्यासी धरती और एक अदद झोंपड़ी
कैर और सांगरी की खुशबू के बीच !!

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