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कविता : तुम्हें समझना

                                                           कविता                          तुम्हें समझना  तुम्हें समझना  जैसे बादलों को समझना है  तुम्हें समझना जैसे धरती को समझना है  तुम्हें समझना केसर और धान को समझना है  तुम्हें समझना प्रकृति की लय को समझना है  तुम्हें समझना जागरे की भट्टी को समझना है  तुम्हें समझना धरती की प्यास को समझना है  तुम्हें समझना  गैर के  संताप को समझना है तुम्हें समझना खेत की मेड को समझना है तुम्हें पढ़ लेना  कविता को समझना है  तुम्हें मानना एक सत्य को समझना  है  सच तो यह है  हम बादल ,धरती ,प्रकृति,मेड  और जगरे की भट्टी  किसी को नहीं समझते  क्योंकि हम ठीक से तुम्हें नहीं समझते !!      

नाट्य समीक्षा : मनुष्य की आशा कभी नहीं खूटती

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                                                                           नाटक 'हुंकारों' का एक दृश्य    मनुष्य की आशा कभी नहीं खूटती जवाहर कला केंद्र, जयपुर के ‘रंगायन’ सभागार में ‘उजागर ड्रामेटिक एसोसिएशन, जयपुर द्वारा मोहित तकलकर के निर्देशन में 6मार्च,2022 को ‘रसरंगम’ में ‘हुंकारों’ नाटक का मंचन किया गया | विजयदान देथा(बिज्जी), अंकित खंडेलवाल और अरविन्द सिंह चारण की कहानियों पर आधारित और तीन भाषाओँ(राजस्थानी,हिंदी और पंजाबी ) में गुंथे संवाद, इस किस्सागोई शैली में मंचित नाटक, कला का अलग आयाम दर्शकों के सामने रखता है | नाटक बिज्जी की कहानी ‘आशा अमर धन’ से शुरू होता है और इसी कहानी के साथ ख़त्म होता | नाटक का मुख्य सन्देश उम्मीद यानी आशा का है | ‘हुंकारों’ यानी जब कोई कहानी या किस्सा सुना रहा है तो उसे सुनने वाले द्वारा दी गई वह प्रतिक्रिया है जिससे पत...

कविता : फाल्गुन में थार

  जैसलमेर की स्मृतियों से एक और विम्ब प्रस्तुत है! प्रकृति कैसे रंग बदलती है फाल्गुन के बाद उसकी एक अनुभूति:कंप्यूटर से सेवन घास को सही फॉण्ट नहीं दे रहा हूँ क्षमा करेंगे ! फाल्गुन में थार माघ के जाते ही लौटने लगे हैं पावणे देश परदेश के बावरी हो उठती है रेत सूरज का माथा चढ़ते ही बिफ़र कर लपकती है आसमान माथे जैसे कह रही हो क्यों छीन ली शीतलता चली आती है डामर की सड़क तक पूछते हुए चाँद का पता झुलसने लगी है सेवन घास झुलसने लगी हैं झाड़ियाँ उतार लिए गए हैं भेड़ों के गहने भी फिर विस्थापित होना है रेवड़ संग भटकना है गाँव दर गाँव जीवन के लिए टोल के टोल फाल्गुन के बाद पीछे रह जाएँगी प्यासी दो आँखें प्यासी धरती और एक अदद झोंपड़ी कैर और सांगरी की खुशबू के बीच !!
  लगभग पैंतीस बरस पहले राजस्थान दिवस पर दिल्ली में आयोजित एक कवि सम्मलेन में भाग लेने गया था ,तब यह गीत लिखा | आज राजस्थान दिवस पर आप सबकी नज़र - मीलों लम्बे रेत के टीले राज बिगड़ते बनते टीले जिनकी तपन से बन कर निकले सोना सा इंसान ऐसा है राजस्थान ... बूँद बूँद पानी को तरसे मेहा बरसे या न बरसे फिर भी शीतल मन से निकले चंग रसिया की तान ऐसा है राजस्थान ... अजब वसंत इन्हें मिलता है छोड़ द्वार-घर चल पड़ता है ऊंटों के रेवड़ संग घूमे सारा हिन्दुस्तान ऐसा है राजस्थान ... सरसों की हर फली कांपती आँगन और दीवार हांफती शायद कोई ग्रहण लगा है जलने लगा इंसान ऐसा है राजस्थान ...