नाट्य समीक्षा : मनुष्य की आशा कभी नहीं खूटती
नाटक 'हुंकारों' का एक दृश्य
मनुष्य की आशा कभी नहीं खूटती
जवाहर कला केंद्र, जयपुर के ‘रंगायन’ सभागार में ‘उजागर ड्रामेटिक एसोसिएशन, जयपुर द्वारा मोहित तकलकर के निर्देशन में 6मार्च,2022 को ‘रसरंगम’ में ‘हुंकारों’ नाटक का मंचन किया गया | विजयदान देथा(बिज्जी), अंकित खंडेलवाल और अरविन्द सिंह चारण की कहानियों पर आधारित और तीन भाषाओँ(राजस्थानी,हिंदी और पंजाबी ) में गुंथे संवाद, इस किस्सागोई शैली में मंचित नाटक, कला का अलग आयाम दर्शकों के सामने रखता है | नाटक बिज्जी की कहानी ‘आशा अमर धन’ से शुरू होता है और इसी कहानी के साथ ख़त्म होता | नाटक का मुख्य सन्देश उम्मीद यानी आशा का है |
‘हुंकारों’ यानी जब कोई कहानी या किस्सा सुना रहा है तो उसे सुनने वाले द्वारा दी गई वह प्रतिक्रिया है जिससे पता चले कि वे उसकी कथा ध्यान से सुन रहे हैं और सुनाने वाला आश्वस्त हो कि श्रोता इस किस्सागोई में हमसफ़र हैं | कोरोना महामारी ने मनुष्यों के बीच संवादहीनता की गहरी खाई उत्पन्न कर दी है | पहले लॉक डाउन ने लोगों को अपने ही घर में निर्वासित कर दिया, फिर संक्रमण के भय ने गले लगना, हाथ मिलाना तो दूर मिलना- जुलना ही छूट गया | परिणामतः आपसी संवाद भी कम हो गया और लोग आत्मकेंद्रित होते चले गए | प्रेम, करुणा और हंसी जैसी अनुभूतियाँ अदृश्य हो गईं और उसकी जगह नीरवता और अवसाद ने ले ली, जिसने सुनाने-सुनाने की रवायत को ही खतरे में डाल दिया | ऐसे माहौल में जहाँ बात करने का मतलब मौत की खबर हो तो कौन कथा कहे और कौन हुंकारे | इस जड़ता को तोड़ने का प्रयास नाटक ‘हुंकारो’ है | इसी आशा के धागे से गुम्फित तीन कहानियों को नाट्य रूपांतरित ‘हुंकारों’ में किया गया है | यह नाटक आपको ‘ओ हेनरी’ की प्रसिद्ध कहानी ’वो आखिरी पत्ता’ की याद दिलाता है जिसमें बीमार चित्रकार जोंसी ने जीने की इच्छा त्याग दी है और वह खिड़की से बाहर बेल के टूटते हुए पत्तों के साथ ही अपने जीवन का अंत मान बैठी है | बेरमन पेंटिंग से बेल का चित्र बना देता है जिस पर लगा पत्ता नहीं गिरता, उसे देख कर जोंसी में जीने की आशा का पुनः संचार हो उठता है |
यह नाटक बहुआयामी है | राजस्थानी भाषा के बहाने विभिन्न भाषाओँ की विशिष्टता और महत्व को रेखांकित करने के साथ-साथ श्रवण कला को भी चिन्हित करता है | अगर नाटक की संरचना की बात करें तो पाँच अंकों में पूरे नाटक को प्रस्तुत किया गया है जिसमें किस्सा और दृष्टि (विज़न) दोनों तत्व सही हुए अनुपात में हैं | बिज़्जी की कहानी जहां पश्चिमी राजस्थान के जीवन की दारुण विपत्तियों और संघर्ष की कहानी है तो दूसरी अन्य कहानियाँ कोरोना समय में विस्थापन और जीवन संघर्ष को दर्शकों के सामने प्रस्तुत करती हैं | दशकों पुरानी अनुभूतियाँ और आज की अनुभूतियों को एक साथ अच्छे से गूँथ कर पेश किया गया है |
|विजय दान देथा की कहानी एक किसान परिवार की कहानी है जिसने पहली पत्नी की मृत्यु के बाद दूसरी शादी कर ली है और पहली पत्नी से एक दो वर्षीय बेटा और तीन वर्षीय बेटी हैं | कई बरस बारिश न होने के कारण अकाल पड़ता है, तब पति-पत्नी रोजगार की तलाश में बंबई जाने की सोचते हैं | बच्चों को साथ ले जाना अपनी मुसीबत बढ़ाना था, यह सोच कर सौतेली माँ को बच्चों को मारने का ख्याल आता है | पिता का अपने जाये बच्चों को मारने के ख्याल से कलेजा कांप उठता है| तब पिता यह सुझाव देता है कि क्यों न हम इन्हें बंद कर के चले जाएँ ,पाँच-सात दिन में भूख से वैसे ही सूख कर कंकाल हो जाएंगे और हत्या का पाप भी नहीं लगेगा| यही सोच कर वे काम पर जाने की बात कह कर बच्चों को झोंपड़ी में बंद करके चले जाते हैं और कह जाते हैं कि सोगरा, रोटी और मटकी में पानी रखा है, भूख लगे तो खा लेना, साँझ को उनके लिए दो झुनझुना लेकर आएंगे | झुनझुनों के बाल सुलभ आकर्षण से बच्चे खुश हो जाते हैं और कहते हैं-“बापू शाम को जल्दी आना, हमारे लिए झुनझुना लाना |” माता-पिता दोनों बच्चों को झूठा दिलासा देकर चले जाते हैं | यहीं बिज्जी कहते हैं कि –“सौतेली माँ का आगमन मौत की अपेक्षा भयानक होता है |” रास्ते में किसान कहता है कि -संसार में सारी माया पानी की है बस, पानी को तो पानी की माँ ने ही जाना है | मरना अच्छा, पर भगवान किसी का पानी नहीं खुटाए |” यह संवाद पानी की पीड़ा के साथ-साथ विस्थापन और माँ का बच्चों से छूटना जैसे सवाल भी खड़ा करता है | जैसे-जैसे उजास कम होने लगा, छोटा भाई बापू को याद करने लगता| बड़ी बहन उसे समझाते हुए कहती – “साँझ पड़ती तो माँ-बापू नहीं आ जाते? अभी साँझ होने में देर है|” नाटक में हाकिम खां मांगनियार के लोक गीतों को कहानियों के प्रसंगों के साथ इस तरह शामिल किया है मानो हजारे की माला में गुलाब टाँक दिए हों | नाटक में जहाँ भी बच्चों को बापू की याद आती या बापू को अपने बच्चों की या विकलांग माँ और उनके पुत्र के बीच का बिछोह या विस्थापन की टीस व्यक्त की है, तब ओलूडी के गीत यानी याद के गीत ‘माता म्हारो रे’, देम दो माँ देम दो’ और धोरा माथे झूँपड़ी जैसे गीत उस कशिश को और गहरा कर दर्शकों के मन तक पहुँचाने में कारगर होते हैं |
नाटक के मध्य में चिराग खंडेलवाल और अरविन्द सिंह चरण की कहानी आती हैं, जो मौजूदा समय की कोरोना त्रासद से न केवल जोड़ती हैं, बल्कि नाटक को व्यापक फलक प्रदान करती हैं | कोरोना काल में हमने महानगरों में प्रवासी मजदूरों को सैकड़ों मील पैदल जाते हुए देखा | एक विकलांग माँ अपने पुत्र से कोरोना काल में बिछड़तीं है और ग्यारह माह बाद मिलती है | इस दौरान झेली गई तकलीफों की कहानी को नाटक में बहुत मार्मिक ढंग प्रस्तुत किया गया | एक जगह पिता कहता भी है –“दुनिया में एक दिन सब कुछ खूटता है पर मनुष्य के मन से कभी आशा नहीं खूटती |” यही नाटक का बीज वाक्य है |
एक बरस बाद सावन -भादों में रेगिस्तानी इलाके में अच्छी बारिश होती है | किसान आकाश की और देख कर कहता है –‘आज उत्तर में धूंधलौ बयरिया |” यह उम्मीद का गीत है, बरखा की उम्मीद| किसान और उसकी पत्नी अपने गाँव लौटते हैं | वे सोच रहे थे कि अब तक बच्चे मर चुके होंगे | झोंपड़ी के नजदीक जाते हैं तो बच्चों की आवाज़ सुनाई देती है | लड़का अपनी बहन से कह रहा था कि- “दोनों झुनझुना मैं लुंगा, और बहन बहलाती है कि हाँ तू ही ले लेना ,साँझ तो होने दे |” माँ जैसे ही दरवाजा खोलती है दोनों उससे लिपट जाते है और झुनझुने माँगते हैं | हताशा और गुस्से से भरी माँ उन्हें मार कर ज़मीन पर पटक देती है और कहती है –“ तुम मरे नहीं, अभी तक जिंदा हो ?” यह सुन कर दोनों बच्चों ने प्राण त्याग दिए | यानी आशा की डोर टूटते ही जीवन ख़त्म |
अगर नाटक के अन्य पक्षों की बात करें तो मैं कहूँगा कि लगभग पिचयासी मिनट की प्रस्तुति दर्शकों को बांधने और मनोरंजन करने में कामयाब रही | नाटक पश्चिमी राजस्थान के जीवन का यथार्थ और लोक संस्कृति को कलात्मक कलेवर के साथ पेश करता है | रेडियो नाटक की तरह मुंह से शब्द चित्र उकेरने के साथ-साथ गतियों का आभास कराना, सचमुच नायाब प्रयोग बन पडा है | संवादों की लय और ध्वनि वैविध्य से नाटक को नई डायमेंशन मिली है | देविका काले का ठेठ राजस्थानी अंगरखा,धोती और महरून पगड़ी का वस्त्र विन्यास दृश्यों को प्रामाणिक बनाता है | पांच दृश्यों में बैठने की मुद्रा में मामूली परिवर्तन किया गया लेकिन अपनी कहन की शैली से अभिव्यक्ति को खूबसूरती प्रदान की | विक्रांत ठाकर की प्रकाश व्यवस्था नाटक की शैली के अनुरूप अच्छी थी | कलाकारों इप्शिता चक्रबर्ती, पुनीत मिश्रा, महेश सैनी, भक्ति भारती, भास्कर शर्मा और अजीत सिंह पालावत का अभिनय क़ाबिलेतारीफ़ है |
कुल मिला कर मोहित तकलकर के निर्देशन में बहुत अच्छा एवं सार्थक प्रयास देखने को मिला, जो भविष्य के अच्छे संकेत देता है |

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